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दया का फल

     

            एक गांव में नदी के पास कुछ लोग एकत्र होकर साप को मार रहे थे। तबी वहा से पंडित जा रहे थे। पंडित  भी एकत्र हुए लोग को देख ने पहोच गए। 



      पंडित  ने कहा : क्यों इस प्राणी को मार रहे हो। पिछले कर्म के कारण वह साप बना है। मंदिर में लोग इस कि पूजा करते है। इसमें भी प्राण बसे हुए है। तबी भीड़ में से युवक बोला..... फिर यह काटता क्यों है।


         युवक की बात सुन कर पंडित ने कहा..... तुम लोग साप को बेवजह मरोगे तो साप कटेगा ही ना ! जब साप पर पाव गिरता है तब ही  साप काटता है। आप से भी ज्यादा डरपोक साप है जो थोड़ी सी आहट होते ही भाग जाता है। गांव के लोग पंडित को बहोत ही आदरभाव करते है। पंडित जी की बात सुन कर गांव के लोगो ने साप को छोड़ दिया।

                कुछ दिनों बाद पंडित जी शाम के समय नदी के किनारे जा रहे थे तब रास्ते मे साप बैठा हुआ था। पंडित जी ने साप को भगाने की बहोत कोशिश की पर साप भागा नही। पंडित जी ने खुद ही नदी के दूसरी तरफ चले गए। सुबह के समय  पंडित जी फिर वही जगह पर गए तो नदी किनारे बहोत बड़ा गड्डा पड़ा हुआ था। अगर साप शाम के समय जाने से नही रोकते तो पंडित जी गड्ढे में गिर जाते या शायद पंडित जी की जान भी चली जाती।

              इसलये ही कहा जाता है कि दया और प्ररोपकार का फल हमेशा हमे अच्छा ही मिलता है।

     

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